॥द्वादश ज्योतिर्लिंगानि॥ अर्थ और कथा सहित

॥श्री गणेशाय नमः॥

 ॥ ॐ नमः शिवाय ॥

॥श्री द्वादश ज्योतिर्लिंगानि॥

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह परम पवित्र ज्योतिर्लिंगों के स्मरण एवं स्तवन के लिए प्रसिद्ध स्तोत्र है। सनातन धर्म में भगवान शिव के इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व माना गया है।

‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द भगवान शिव के उस दिव्य स्वरूप का बोध कराता है, जिसमें वे अनन्त प्रकाश एवं ज्योति के रूप में प्रकट हुए। श्रद्धापूर्वक द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण, दर्शन एवं स्तवन करने से मन में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण की भावना दृढ़ होती है—ऐसी धार्मिक मान्यता है।


॥ अथ श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्गानि ॥

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम् ॥१॥

भावार्थ: सौराष्ट्र में भगवान सोमनाथ, श्रीशैल पर्वत पर भगवान मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में भगवान महाकालेश्वर तथा ओंकार क्षेत्र में भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। इन पवित्र ज्योतिर्लिंगों को भगवान शिव के दिव्य स्वरूप के रूप में श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है।


परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम् ।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥२॥

भावार्थ: परली क्षेत्र में भगवान वैद्यनाथ, डाकिनी क्षेत्र में भगवान भीमशंकर, सेतुबन्ध में भगवान रामेश्वर तथा दारुकावन में भगवान नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं।


वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे ।
हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये ॥३॥

भावार्थ: वाराणसी में भगवान विश्वेश्वर अर्थात् काशी विश्वनाथ, गौतमी नदी के तट पर भगवान त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय में भगवान केदारनाथ तथा शिवालय में भगवान घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं।


एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥४॥

भावार्थ: जो मनुष्य प्रातःकाल और सायंकाल इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ एवं स्मरण करता है, उसके सात जन्मों में किए गए पापों का नाश हो जाता है—ऐसी धार्मिक मान्यता है।


द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम, समास, अर्थ एवं पौराणिक कथाएँ

१. सोमनाथः  सोमस्य नाथः

अर्थ: जो सोम अर्थात् चन्द्रमा के नाथ (स्वामी) हैं।

कथा

प्रजापति दक्ष की सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव के साथ हुआ था। ये सत्ताईस कन्याएँ सत्ताईस नक्षत्रों के स्वरूप में मानी जाती हैं। चन्द्रदेव को अपनी सभी पत्नियों में रोहिणी विशेष रूप से प्रिय थीं। इस कारण अन्य पत्नियाँ दुःखी होकर अपने पिता दक्ष के पास गईं और अपनी व्यथा सुनाई।

प्रजापति दक्ष ने चन्द्रदेव को समझाया कि उन्हें सभी पत्नियों के प्रति समान भाव रखना चाहिए, परन्तु चन्द्रदेव ने उनकी बात नहीं मानी। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने चन्द्रदेव को क्षय होने का श्राप दे दिया।

श्राप के प्रभाव से चन्द्रमा का तेज धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। चन्द्रदेव अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने भगवान शिव की कठोर आराधना आरम्भ की।

चन्द्रदेव की तपस्या एवं भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें दक्ष के श्राप से मुक्ति प्रदान की। चन्द्रदेव की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव वहीं सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।



२. मल्लिकार्जुनः  मल्लिका च अर्जुनश्च

अर्थ: मल्लिका अर्थात् माता पार्वती और अर्जुन अर्थात् भगवान शिव। शिव और माता पार्वतीका स्वरूप अर्थात् अर्धनारीश्वर।

कथा

भगवान शिव और माता पार्वती के दो पुत्र—श्री गणेश एवं भगवान कार्तिकेय—के विवाह के विषय में एक बार यह निश्चय किया गया कि जो पहले सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा।

भगवान कार्तिकेय अपने मयूर पर आरूढ़ होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। श्री गणेशजी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता ही सम्पूर्ण जगत के आधार एवं समस्त तीर्थों के समान हैं।

श्री गणेशजी की इस बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उन्हें विजयी घोषित किया गया।

यह देखकर भगवान कार्तिकेय दुःखी होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। माता पार्वती और भगवान शिव अपने पुत्र को देखने के लिए वहाँ पहुँचे।

माता पार्वती को मल्लिका तथा भगवान शिव को अर्जुन नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। इस कारण वहाँ भगवान शिव मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुए।



३. महाकालेश्वरः — महाकालस्य ईश्वरः

अर्थ: जो महाकाल के ईश्वर (स्वामी) हैं।

कथा

प्राचीन काल में उज्जयिनी नगरी में वेदप्रिय नाम के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहते थे। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनके पुत्र भी शिवभक्ति में लीन रहते थे।

उसी समय दूषण नामक एक अत्याचारी असुर ने अपनी शक्ति के बल पर ऋषियों, ब्राह्मणों एवं शिवभक्तों को कष्ट देना आरम्भ कर दिया। उसने उज्जयिनी पर आक्रमण करके वहाँ भगवान शिव की पूजा एवं आराधना में विघ्न डालने का प्रयास किया।

भक्तों की रक्षा के लिए भगवान शिव अत्यन्त उग्र एवं भयंकर स्वरूप में प्रकट हुए और दूषण का संहार किया।

भक्तों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उसी स्थान पर निवास स्वीकार किया और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए।



४. ॐकारेश्वरः — ॐकारस्य ईश्वरः

अर्थ: जो ॐकार के ईश्वर (स्वामी) हैं।

कथा

पौराणिक कथा के अनुसार विंध्य पर्वत ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यन्त कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके समक्ष प्रकट हुए।

विंध्य पर्वत ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे वहीं निवास करें। भगवान शिव ने अपने भक्त की प्रार्थना स्वीकार की और उस स्थान पर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हुए।

नर्मदा नदी के मध्य स्थित यह पवित्र क्षेत्र ॐ के आकार के समान माना जाता है। इसी कारण यहाँ विराजमान भगवान शिव ॐकारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।



५. वैद्यनाथः — वैद्यानां नाथः

अर्थ: जो वैद्यों के नाथ (स्वामी) हैं।

कथा

लंका के राजा रावण भगवान शिव के परम भक्त थे। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने अत्यन्त घोर तपस्या की। अपनी भक्ति सिद्ध करने के लिए रावण ने अपने एक-एक मस्तक को भगवान शिव को अर्पित करना प्रारम्भ कर दिया।

रावण की कठोर तपस्या और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने रावण के मस्तकों को पुनः जोड़कर उसे स्वस्थ कर दिया।

भगवान शिव द्वारा वैद्य के समान रावण का उपचार करने के कारण वे वैद्यनाथ नाम से प्रसिद्ध हुए।

रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाना चाहता था। भगवान शिव ने उसे शिवलिंग प्रदान किया, परन्तु यह शर्त रखी कि मार्ग में इसे भूमि पर नहीं रखना है।

देवताओं ने रावण की यात्रा में विघ्न उत्पन्न करने के लिए एक युक्ति की और वह शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित हो गया। यही स्थान आगे चलकर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।



६. भीमशङ्करः — भीमः शङ्करः

अर्थ: जो भयंकर एवं प्रचण्ड स्वरूप वाले शंकर हैं।

कथा

कुम्भकर्ण का पुत्र भीम अत्यन्त शक्तिशाली असुर था। उसे अपनी शक्ति पर अत्यधिक गर्व था। उसने देवताओं, ऋषियों और साधुजनों को कष्ट देना प्रारम्भ कर दिया।

भीमासुर ने भगवान शिव के भक्त कामरूपेश्वर को भी बंदी बना लिया और उन्हें शिवपूजा करने से रोकने का प्रयास किया।

परन्तु संकट की उस घड़ी में भी कामरूपेश्वर ने भगवान शिव का स्मरण एवं पूजन नहीं छोड़ा। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और भीमासुर का संहार किया।

भक्तों की प्रार्थना पर भगवान शिव वहीं भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।



७. रामेश्वरः — रामस्य ईश्वरः

अर्थ: जो श्रीराम के ईश्वर (आराध्य) हैं।

कथा

रामायण की प्रसिद्ध कथा के अनुसार माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्रीराम दक्षिण दिशा में समुद्र के तट पर पहुँचे। लंका जाने के लिए उन्हें समुद्र पार करना था।

लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रस्थान करने से पूर्व भगवान श्रीराम ने भगवान शिव की पूजा करने का संकल्प किया।

हनुमानजी शिवलिंग लाने के लिए गए थे। उनके लौटने में विलम्ब होने पर माता सीता ने समुद्र के तट की रेत से शिवलिंग का निर्माण किया। भगवान श्रीराम ने उसी शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा एवं आराधना की।

भगवान श्रीराम द्वारा पूजित होने के कारण भगवान शिव का यह स्वरूप रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।



८. नागेश्वरः — नागानाम् ईश्वरः

अर्थ: जो नागों के ईश्वर (स्वामी) हैं।

कथा

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार सुप्रिया नाम की एक परम शिवभक्त स्त्री थी। एक बार दारुक नामक राक्षस ने सुप्रिया सहित अनेक लोगों को बंदी बना लिया।

बंदीगृह में रहते हुए भी सुप्रिया ने भगवान शिव का स्मरण और नामजप करना नहीं छोड़ा। उसने अन्य बंदियों को भी भगवान शिव की आराधना करने के लिए प्रेरित किया।

सुप्रिया की प्रार्थना और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने दारुक का संहार किया और अपने भक्तों को उसके अत्याचार से मुक्त कराया।

इसके पश्चात् भक्तों की प्रार्थना पर भगवान शिव वहाँ नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।



९. विश्वेश्वरः — विश्वस्य ईश्वरः

अर्थ: जो सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर (स्वामी) हैं।

कथा

काशी नगरी को भगवान शिव की परम प्रिय नगरी माना जाता है। सनातन परम्परा में काशी को भगवान शिव की अविमुक्त नगरी कहा गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने काशी को अपना निवासस्थान स्वीकार किया। यहाँ वे विश्वनाथ अथवा विश्वेश्वर के रूप में विराजमान हैं।

सम्पूर्ण विश्व के नाथ होने के कारण भगवान शिव को विश्वेश्वर कहा जाता है।

काशी में भगवान शिव के स्मरण, दर्शन एवं पूजन का विशेष धार्मिक महत्त्व माना गया है। इसी पवित्र काशी में विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग विराजमान है।



१०. त्र्यम्बकेश्वरः — त्रीणि अम्बकानि यस्य सः

अर्थ: जिनके तीन नेत्र हैं, वे त्र्यम्बक हैं।

कथा

प्राचीन काल में ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ ब्रह्मगिरि पर्वत के समीप निवास करते थे। एक समय उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा।

गौतम ऋषि ने वरुणदेव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वरुणदेव ने उनके आश्रम में जल की व्यवस्था कर दी। इससे अनेक ऋषि-मुनियों का जीवन भी सुगम हुआ।

किन्तु कुछ ऋषि गौतम ऋषि से ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने एक मायावी गाय की घटना के कारण गौतम ऋषि पर गोहत्या का दोष लगा दिया।

गौतम ऋषि अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने भगवान शिव की कठोर आराधना की। भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए।

गौतम ऋषि ने भगवान शिव से गंगा को पृथ्वी पर प्रकट करने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना से गंगा वहाँ प्रकट हुई और आगे चलकर गोदावरी नदी के रूप में प्रसिद्ध हुई।

भगवान शिव भी उसी पवित्र स्थान पर त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।



११. केदारनाथः — केदारस्य नाथः

अर्थ: जो केदार के नाथ (स्वामी) हैं।

कथा

महाभारत युद्ध के पश्चात् पाण्डव अपने बन्धु-बान्धवों के वध से उत्पन्न पाप से मुक्ति प्राप्त करना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शिव के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे।

भगवान शिव पाण्डवों की परीक्षा लेने के लिए वृषभ अर्थात् बैल का रूप धारण करके वहाँ से अन्तर्धान होने लगे।

पाण्डवों को जब भगवान शिव के उस स्वरूप का पता चला, तब भीम ने उस वृषभ को पकड़ने का प्रयास किया। उसी समय वृषभ का अग्रभाग भूमि में समा गया।

भगवान शिव ने अन्ततः पाण्डवों को दर्शन दिए और उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।

भगवान शिव का यह पवित्र स्वरूप केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।



१२. घृष्णेश्वरः — घृष्णायाः ईश्वरः

अर्थ: जो घृष्णा के ईश्वर (स्वामी) हैं।

कथा

घृष्णा नाम की एक परम शिवभक्त स्त्री थी। वह प्रतिदिन अनेक पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण करती, विधिपूर्वक भगवान शिव का पूजन करती और तत्पश्चात् उन शिवलिंगों का जल में विसर्जन करती थी।

घृष्णा का एक पुत्र था। उसकी बहन अथवा सपत्नि को घृष्णा से ईर्ष्या थी। ईर्ष्या के कारण उसने घृष्णा के पुत्र की हत्या कर दी और उसके शरीर को जल में फेंक दिया।

जब घृष्णा को इस घटना का पता चला, तब भी उसकी भगवान शिव के प्रति भक्ति विचलित नहीं हुई। उसने अपने पुत्र के वियोग में अत्यन्त दुःख होने पर भी भगवान शिव की नियमित पूजा नहीं छोड़ी।

घृष्णा की अटूट एवं निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके समक्ष प्रकट हुए और उसके पुत्र को पुनः जीवित कर दिया।

घृष्णा ने भगवान शिव से वहीं सदैव निवास करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और वहाँ घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।


🙏 महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश

द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा केवल उनके नामों के स्मरण तक सीमित नहीं है। इन पवित्र कथाओं में भक्ति, श्रद्धा, धैर्य, सत्य, तपस्या, समर्पण और धर्माचरण का गहन संदेश निहित है।

भगवान शिव की कृपा केवल स्तोत्र के पाठ से ही नहीं, बल्कि भक्ति, सदाचार, सत्यनिष्ठा, परिश्रम, सेवा और जनकल्याण की भावना से जीवन जीने में भी अनुभव की जाती है।

ज्योतिर्लिंगों का स्मरण हमें अपने जीवन में भगवान शिव के गुणों को धारण करने तथा सदैव धर्म, भक्ति और सत्कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

॥ हर हर महादेव ॥

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

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